GST Cut in India 2025 Why States Are Delaying Tax Relief for Citizens | Tips & Guide

GST Cut in India 2025

भारत में 2025 में जीएसटी कटौती: नागरिकों के लिए टैक्स राहत में राज्य क्यों कर रहे हैं देरी? युक्तियाँ और मार्गदर्शिका

हर साल की तरह, 2025 में भी लाखों भारतीय करदाताओं की एक ही ख्वाहिश है: जीएसटी दरों में कमी (GST Cut)। हम सभी चाहते हैं कि रोज़मर्रा की चीज़ें सस्ती हों, पेट्रोल-डीज़ल पर भार कम हो, और हमारा मासिक बजट थोड़ा हल्का महसूस हो। आखिरकार, जीएसटी का मकसद ही “एक राष्ट्र, एक कर” व्यवस्था के ज़रिए आम आदमी को राहत देना था।

लेकिन, अजीब बात यह है कि जीएसटी परिषद (GST Council) की बैठकों में जब भी दरें कम करने की बात आती है, कई राज्य (States) इस विचार में देरी कर देते हैं या सीधे मना कर देते हैं। ऐसा क्यों? क्या राज्य हमें सस्ती चीज़ें नहीं दिलाना चाहते? जवाब इतना आसान नहीं है।

इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि 2025 में जीएसटी कटौती को लेकर क्यों हो रही है देरी (Delay), राज्यों के पास इसे रोकने के क्या ठोस कारण हैं, और आप एक नागरिक के तौर पर इस स्थिति में क्या कर सकते हैं।

भाग 1: बड़ा सवाल – राज्य जीएसटी कटौती को क्यों रोक रहे हैं? (असली कारण)

राज्यों का जीएसटी कटौती को रोकना किसी व्यक्तिगत दुश्मनी या सरकारी आलस की वजह से नहीं है। उनके पास इसके पीछे ठोस वित्तीय कारण हैं। आइए, उन कारणों को समझते हैं:

1. क्षतिपूर्ति सेस का खात्मा (The End of an Era):
जीएसटी व्यवस्था जब 2017 में शुरू हुई थी, तो राज्यों को डर था कि कहीं उनकी राजस्व (आमदनी) कम न हो जाए। इसलिए, केंद्र सरकार ने उन्हें 5 साल तक राजस्व के नुकसान की भरपाई (Compensate) करने का वादा किया था। यह क्षतिपूर्ति 2022 में खत्म हो गई। अब राज्य पूरी तरह से अपने जीएसटी संग्रह पर निर्भर हैं। अगर दरों में कटौती हुई, तो उनकी आने वाली आमदनी पर सीधा असर पड़ेगा, और वे अपने खर्चे (जैसे स्कूल, अस्पताल, सड़क) चलाना मुश्किल हो सकता है।

2. राजस्व तटस्थ दर (RNR) का डर:
जीएसटी व्यवस्था को एक ऐसी दर पर डिजाइन किया गया था जो सरकार को पहले जितना राजस्व देती थी—इसे राजस्व तटस्थ दर (Revenue Neutral Rate – RNR) कहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अभी भी कई क्षेत्रों में जीएसटी दरें आरएनआर से नीचे हैं। इसका मतलब है कि संग्रह पहले से ही कम है। अगर और दरों में कटौती की गई, तो केंद्र और राज्य दोनों की तिजोरी पर बोझ पड़ेगा, जो एक संघर्षरत अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं है।

3. COVID-19 का वित्तीय प्रभाव:
कोविड-19 महामारी ने केंद्र और राज्य सरकारों, दोनों की अर्थव्यवस्था को बहुत पीछे धकेल दिया था। कर्ज़ ज़्यादा हो गए, खर्चा बढ़ गया, और आमदनी कम हुई। अब सरकारें अपने वित्त को स्थिर करने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे मौके पर टैक्स राजस्व को कम करना एक ऐसा कदम होगा जिससे वह स्थिरता फिर से खो सकते हैं।

4. “सहकारी संघवाद” की व्यावहारिकता:
जीएसटी परिषद एक ऐसा मंच है जहाँ केंद्र और राज्य दोनों बैठकर फैसला करते हैं। हर फैसला सर्वसम्मति (Unanimous) या बहुमत से होता है। अगर कोई एक राज्य मना कर देता है, तो प्रस्ताव अटक जाता है। दक्षिणी और आर्थिक रूप से विकसित राज्य, जो ज़्यादा टैक्स देते हैं, वे अक्सर दरों में कटौती के खिलाफ वोट करते हैं क्योंकि उन्हें राजस्व नुकसान का सबसे ज़्यादा डर होता है।

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भाग 2: आप कहाँ उम्मीद कर सकते हैं? (राहत के संभावित क्षेत्र)

लेकिन, उम्मीद पूरी तरह नहीं मरी है। जीएसटी परिषद हमेशा जनता की मांग सुनता है। 2025 में इन क्षेत्रों में कुछ राहत की गुंजाइश हो सकती है:

  • स्वास्थ्य और बीमा: हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम पर अभी 18% जीएसटी लगता है, जिसे कम करके 12% किए जाने की बात चल रही है। यह एक अहम और इंसानियत भरा कदम होगा।
  • इलेक्ट्रिक वाहन (EV): केंद्र सरकार ईवी को बढ़ावा देने पर फोकस कर रही है। ईवी बैटरियों, चार्जिंग स्टेशनों या पार्ट्स पर जीएसटी दरें और कम की जा सकती हैं ताकि ग्रीन एनर्जी को प्रोत्साहन मिले।
  • ऑनलाइन गेमिंग: 28% जीएसटी का भारी टैक्स ऑनलाइन गेमिंग उद्योग पर बोझ बन रहा है। इस पर पुनर्विचार हो सकता है, लेकिन इसमें राज्यों का नज़रिया अलग-अलग है।

भाग 3: युक्तियाँ और मार्गदर्शिका: टैक्स राहत का इंतज़ार न करें, अभी से पैसे बचाएँ

जब तक बड़ी जीएसटी कटौती नहीं होती, आप इन व्यावहारिक युक्तियों (Tips) को फॉलो करके अपने पैसे बचा सकते हैं:

1. बिल माँगें, टैक्स बचाएँ (Always Ask for a Bill):
जब भी कोई सामान खरीदें, जीएसटी इनवॉइस (बिल) ज़रूर माँगें। क्यों?

  • आपका अधिकार है: विक्रेता आपसे जो जीएसटी ले रहा है, उसे वह सरकार को देना है। बिल न देने का मतलब है कि वह टैक्स चुपके से रख रहा है।
  • इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC): अगर आप व्यवसायी हैं, तो बिल के ज़रिए आप इनपुट टैक्स क्रेडिट क्लेम कर सकते हैं, जिससे आपका टैक्स बोझ कम होता है।

2. जीएसटी दरें जानें (Know Your GST Slabs):
अपने रोज़मर्रा के इस्तेमाल की चीज़ों की जीएसटी स्लैब जानकर शॉपिंग करें। आप होशियारी से कम जीएसटी वाले प्रोडक्ट्स चुन सकते हैं।

  • 0% जीएसटी: ताजे फल, सब्जियाँ, दूध, अंडे, आदि।
  • 5% जीएसटी: चीनी, चाय, कॉफी, खाद्य तेल, जानलेवा दवाएँ।
  • 12% जीएसटी: मक्खन, पनीर, घी, आयुर्वेदिक दवाएँ।
  • 18% जीएसटी: साबुन, टूथपेस्ट, हेयर ऑयल, कैपिटल गुड्स।

3. ऑनलाइन कीमतों की तुलना करें:
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर एक ही प्रोडक्ट के लिए अलग-अलग विक्रेता अलग-अलग कीमतें देते हैं। अंतिम कीमत (जीएसटी सहित) की तुलना करके ही खरीदारी करें।

4. व्यवसायियों के लिए: अपने आईटीसी को अधिकतम करें:
अगर आप व्यवसायी हैं, तो सुनिश्चित करें कि आप हर पात्र खरीद का बिल रखते हैं और अपना इनपुट टैक्स क्रेडिट सही तरीके से कैलकुलेट करते हैं। यह आपके नकदी प्रवाह को काफी हद तक कम कर सकता है। एक चार्टर्ड अकाउंटेंट से सलाह लें।

निष्कर्ष: समझदारी और धैर्य की ज़रूरत

राज्यों का जीएसटी कटौती को रोकना उनकी मजबूरी है, न कि मर्जी। वे अपनी वित्तीय स्थिरता को बचाना चाहते हैं ताकि वे आपको बेहतर सुविधाएँ दे सकें। आने वाले समय में, जब अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और राज्यों की वित्तीय सेहत बेहतर होगी, तब ही बड़े पैमाने पर टैक्स राहत (Tax Relief) मुमकिन होगी।

तब तक, एक स्मार्ट करदाता बनने का फैसला करें। बिल माँगें, अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाएँ, और जीएसटी नियमों को अच्छी तरह समझकर अपने पैसे बचाने के तरीके अपनाएँ। जागरूकता ही आपकी सबसे बड़ी ताकत है।


नोट: यह लेख सामान्य आर्थिक सिद्धांतों और जीएसटी परिषद की ज्ञात संरचना के आधार पर सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए लिखा गया है। 2025 के लिए वास्तविक निर्णय जीएसटी परिषद की अपनी बैठकों में लिए जाएंगे, और यह लेख उन निर्णयों के पीछे के संभावित कारणों को समझाने का कार्य करता है।

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